अंधरे से प्यार... Andhere
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Altın Yaprak
अंधरे से प्यार
शनिवार, ११ जनवरी २०२०
मुझे अँधेरे से प्यार था
दिल से चाहा यार था
बस कुछ भी अच्छा नहीं सुहाता था
मुझे उसका बने रहना बहुत भाता था।
क्यों डरते है लोग अँधेरे से?
कामतो ढेरो करते है धीरे से!
उजाले में नहीं होता वो अंधरे में करते है
फिर सब की कानाफूसी करते रहते है।
मुझे बहुत तरस आता उनपर
उजाला बरसाता उनपर कहर
रात में आकर छीप जाते आगोश में
सुबह होते ही भाग जाते मानो खरगोश।
बहार के उजाले से क्या होता?
मन की आत्मा को कौन पहचानता?
यही है हमारी दीनता
दिखलाती है नीचता और हीनता।
उजाले से तो अंधेरा अच्छा
ना कोई आके करता पृच्छा
उजाले के भागा अंधेरे की शरण लेता
सिसकता रोता और अपना मुंह छुपाता।
हसमुख मेहता
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