छाई उदासी..... Chaai
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Altın Yaprak
छाई उदासी
सोमवार, ३ सितम्बर२०१८
मेरे मन में छाई उदासी
मन देखने को है अभिलाषी
आप तो हो गए अब परदेशी
मन है प्यासा, आँखे तरसी।
ना मन को भाये
ना भूख लगाए
दिन में शोकातुर और मन है व्यग्र
चीड़ चीड़ जाता और हो जाता उग्र।
कैसे सुनाऊ अपनी कहानी?
डर लग ता है, ना हो अनहोनी
फिर भी करली अपनी मनमानी
हो गई किरकिरी और मानहानि।
मन को लगाम दो
लूली जो ना कहने दो
उसको छोड़ा तो हो जाएगा महाभारत
देख ने जैसी नहीं रहेगी मूरत।
आस लगाऊं
मन को मनाऊं
यही कही देखूं और पुकारूँ
ना देखूं तो लागे अकारुं।
प्रेम की भाषा
ना होती सहसा
हर कोई समझे, हर कोई बोले
अपने आप से तोले मोले।
प्रेम का रोग कभी लग जावे
मन को जैसे कुछ ना भावे
भीतरी शांति को आग लगावे
जीते जीव मोत बुलावे।
हसमुख अमथालाल मेहता
आभार: सात्ची आर्ट
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