इंतेझार.. Inte
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Altın Yaprak
इंतेझार
गुरूवार, ६ सितम्बर २०१८
कहाँ गए वो पल?
नहीं हुई कोई हलचल
वो मनचला हो गया चल
मुझे भटक ने के लिए दरदर।
पता नहीं रात कैसे बीती!
किसे सुनाऊँ में अपनी आपबीती
मैं बिलखती रही रोतीरोती
रह गई राह देखती देखती।
नही मुझे सुनना किसी के किस्से
क्या आएगा मेरे हिस्से?
हम तो अब बुरी तरह फंसे!
बही हंस भी सकते जोर से ।
हम ना तो है लैला
बस भा गया था छैला
पर उसने तो हमे ही छला
कर गया अपना मुंह काला।
प्रेम का मतलब नहीं समझा
बस निकला चलतापुर्जा
एक ही तोल में सब को तोला
मेरे जीवन में जहर को गोला।
जीना तो पडेगा
सबका सामना भी करना पडेगा
मुंह छीपाने सेकाम नही चलेगा
सही समय का इंतेझार करना पडेगा।
हसमुख अमथालाल मेहता
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