कहाँ भूल पाता..Kahan
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Altın Yaprak
कहाँ भूल पाता
शनिवार, ६ जुलाई २०१९
कहाँ भूल पाता हूँ?
कहाँ सो पाता हूँ?
बस याद ही ला पाता हूँ!
मुरझे हुए चमन में फूल कहाँ ढूंढ पाता हूँ?
ना कोई वादा था
ना कोई इरादा था
बस मन ही मन को चाहा था
दिल भी तड़पा बेतहाशा था।
बस हो गई अब तो याद धुंधली
चेहरा में भी दिखती हो पतली
तुम थी सबसे अलग और निराली
मैंने ऐसी कभी नहीं निहाली।
बस तो गई थी उसी दिन से
चाहा फिर भी नहीं निकली मन से
अब तो बस एक ही है आरजू
और रहेगी अंत तक यहु जुत्सु।
मन तो रहेगा खाली
जब तक नहीं मिलेगी प्यार की प्याली
नहीं समली जाती प्यार की कहानी
बस अब तो मन में एक ही बात को ठानी।
रहेंगे जब तक चाँद और सितारे
चलते रहेंगे चर्चे भी हमारे
कहो तुम ना अपनी जुबाँ से!
रहां सदा मेहरबाँ अपनी मर्जी से
हसमुख मेहता
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