सहती रहूंगी Sahti
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Altın Yaprak
सहती रहूंगी
कितने साlल गुजर गए
जिंदगी बसर करते हुए
मे तो पिसती ही रही
बस कोसती ही रही।
क्या क्या नहीं किया सबकी खिदमत में?
सब को रखा सलामत मैंने
पाला पोसा और लायक बनाया
उसने मुझे क्या जताया?
आईना कुछ नहीं बोलता
बस वो ही चीखता
जो तुम चिल्लाते
फिर शांत हो जाते।
में नहीं करती अपने आपको किसी के हवाले
कितने ही क्यों न हो सब मतवाले?
मैंने सहा है ओर सहती रहूंगी
पर दिल से उफ़ तक नहीं कहूँगी।
मेरी कहानी साफ है
सब को अपनी गलती माफ़ है
में ठहरी एक सहशीलता की मूरत
समय जी पराकाष्ठा और हंसती हुई सूरत।
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