एक विश्राम गृह -
M
0
Altın Yaprak
एक विश्राम गृह
मूल कविता - मौलाना जलालुद्दीन रूमी द्वारा
हिंदी रूपांतरण - मुहम्मद आसिम नेहल द्वारा
ये मानव शारीर एक विश्राम गृह है
हर सुबह कोई न कोई नया यात्री यहाँ आता है
कभी ख़ुशी, कभी निराशा, कभी नीचता,
कुछ क्षणिक जागरूकता एक अप्रत्याशित
मेहमान के रूप में आती है
सभी का स्वगत और सत्कार करो
भले ही वो दुखों के रेले हों
जो अचानक किसी तूफ़ान की तरह आये और
आपका हौसला पस्त कर दे,
सभी का सम्माम करो
क्या जाने वो क्या सन्देश लाए हो
ये खौफनाक ख्याल, ये शर्म, ये द्वेष
इन्हे दरवाज़े पर हँसके मिले और आमंत्रित करे अंदर आने के लिए
सभी आने वाले का शुक्रिया अदा करे
क्यूंकि सभी आनेवाले परमात्मा के भेजे हुए मार्गदर्शक हैं.
Bu şiiri puanla
Henüz puan verilmemiş