शम्मा जलती है तो जले! ! !
M
0
Altın Yaprak
शम्मा जलती है तो जले, हम वो परवाने हैं
जिन्होंने सब्र ओ इस्तकलल का सबक खूब पढ़ा है
अब कहाँ बनते है, लैला-मजनू हीर-राँझा, शिरीन-फरहात के किस्से
ये तो अब महज़ किसी किताबों के अफसानो में मिले
रात अपने आग़ोश में क्या क्या कमाल लाती थी कभी
अब तो रातों के दामन में भी मचलते उजाले हैं मिले
ऑंखें कहाँ खोलती हैं रास्ते दिलों को जाने के
आंसुओं के सैलाब में डुबो देते हैं ये पैग़ाम के सिले
अब तुम इस बात की उम्मीद न रखना 'आशी' ये कभी
की कश्तियों पे मिल जायेंगे साहिल के पते
Bu şiiri puanla
Henüz puan verilmemiş