Sonnet - Apni Premika Se Wasiyat
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Altın Yaprak
Original Poem Sonnet Lxxii
By William Shakespeare
हे प्रिये, ये दुनिया तुमसे क्या सुनना चाहेगी अब
कौन सी योग्यता थी मुझमे, कि मृत्यु के बाद भी
तुम प्यार करती रहो अब भूल भी जाना धीरे से मुझे
मुझमे एसी कोई योग्यता नहीं जिसे तुम साबित करो
बल्कि किसी झूठ के सहारे से तुम ऐसा कर पाओ
जब कि मै खुद किसी मरुस्थल की तरह जीवन भर रहा
और अब मेरे मृत शरीर पर प्रशंसा का बोझ न लटका देना
प्रिये, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारा सच्चा प्यार झूठा लगने लगे
और तुम मेरी प्रशंसा कि ख़ातिर झूठ कासहारा लो
मेरा नाम भी वही दफन करना जहाँ मेरा शरीर
याद रहे ये नाम न रह जाये, शर्मिंदा करने तुम्हे और मुझे
मै तो अपनी करनी पर वैसे ही शर्मिंदाहूँ
और तुम्हे भी शर्मिदा होना चाहिए, कि मै प्यार के काबिल न था
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