यहाँ पाबन्दी है जनाब
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Altın Yaprak
रहते तो हैं हम आज़ाद मुल्क में,
जी रहे हैं लेकिन पाबंदियों में जनाब
कहीं ऑंखें देख न ले उनको,
इसलिए नाज़ों की पाबन्दी
नज़रों में नज़ारे न उतर आये
इसलिए नज़रों पे पाबन्दी
यहाँ ये पाबन्दी, वहां वो पाबन्दी -
चारों तरफ शोर है की कहाँ है पाबन्दी?
यहाँ उठने पे पाबन्दी, वहां बैठने पे पाबन्दी
कहीं पे जाने की पाबन्दी, कहीं से आने की पाबन्दी
ये पाबन्दी लिख दी गयी है अब हर माथे पे जनाब
जिसे जब पढ़ना है जहाँ पढ़ना है, पढ़ ले ये पाबन्दी
पहले भी थी पाबन्दी, सदियों से चली आ रही है ये पाबन्दी
मुल्कों ने तो बा कायदा लकीरें खेंच कर लिख दी है
हमारे यहाँ आने की पाबन्दी, आ गए हो तो देख भी लेना
कहाँ पर लगा रखी हैं हमने कैसी कैसी पाबन्दी
यहाँ तो बस्ती है जनाब घरों घरों में पाबन्दी
दिन में पाबन्दी, रातों को पाबन्दी
साँसों से आती है पाबन्दी साँसों से जाती है पाबन्दी
अब तो दिलों में बसने लगी है पाबन्दी
मस्जिदों में पाबन्दी, मंदिरों में पाबन्दी
गिरजाघरों में, गुरुद्वारों में हर द्वारों पे पाबन्दी
डरलगने लगा है अब की कहीं
सोच पे, ख्यालों पे भी न आ जाये ये पाबन्दी!
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