Zameer - Hindi Poemज़मीरconscience
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Altın Yaprak
वो जो फिर न आने की क़सम खा के चला गया
वो क्यों लौट आया?
कभी यादों का झोका बन के, कभी टूटे हुए वादों सा
सुबह शम्स की शक्ल में, रात को माहताब बन के
अब तो साँसों में भी बसने का हुनर सीख लिया
पलकें भी बंद कर लू तो रहता है ज़ेहन के कोने में
डर लगने लगा है अपनी ही परछाई से
ये हाल किया है इसने मेरा - " मेरा अपना ज़मीर "
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