बसन्त का अवसान।
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Altın Yaprak
तुम मधुर रस की बावरी
उसमें धो डाला प्रिये
जीवन की विभावरी
तुम प्रिये मेरे संग गाओ
पुष्पलता का चैतावर
जैसे प्रगाड़ के जीवन में
आई हो एक नई बहार ।।
हर प्राणी आज झूम रहे हैं
नई आशाओं की किरणों में
रात्रि के शीतल प्रहर में
चंद्रमा की चांदनी में
बरस रही सुख की ज्योत्स्ना
पूरे अनन्त क्षीर सागर में।।
हे सखी तुम चैत्र माह में आना
नीज श्रृंगार से पुलकित होकर
सुबह का धूप बरसाना ।।
आज निरंतर विचलित हूं मैं
प्रेम प्रसंग न बतलाऊंगा
अपने ही निज कण्ठो से
प्रेम आशीष जगाऊंगा।।
तुम मेरे हो प्रेम पिया
जीवन की हरियाली हो
तुम हो काया कल्प हमारे
बालात्तप के रखवाले हो
04/10/2025
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@ Ramesh Rai
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