हरि-स्रमजल अंतर-तनु भीजे ता लालच न धुआवति सारी। अधोमुख रहति उरध नहिं चितवति ज्यों गथ हारे थकित जुआरी। छूटे चिहुर, बदन कुम्हिलाने, ज्यों नलिनी हिमकर की मारी॥ हरि-सँदेस सुनि सहज मृतक…
अपरस रहत सनेहतगा तें, नाहिंन मन अनुरागी॥ पुरइनि-पात रहत जल-भीतर ता रस देह न दागी। ज्यों जल माँह तेल की गागरि बूँद न ताके लागी॥ प्रीति-नदी में पावँ न बोस्यो, दृष्टि न रूप परागी।…
कहत सुनत घट प्रान रहत हैं, हरि तजि भजहु अकास॥ बिरही मीन मरत जल बिछुरे छाँड़ि जियन की आस। दास-भाव नहिं तजत पपीहा बरु सहिं रहत पियास॥ प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली प्रीतम के बनवास।…
कैतव-बचन छाँड़ि हरि हमको सोइ करैं जो मूल। जोग हमैं ऐसो लागत है ज्यों तोहि चंपक फूल॥ अब क्यों मिटत हाथ की रेखा? कहौ कौन बिधि कीजै? सूर, स्याममुख आनि दिखाओ जाहि निरखि करि जीजै॥१०२॥
आवैंगे दिन चारि पाँच में हम हलधर दोउ भैया॥ जा दिन तें हम तुमतें बिछुरे काहु न कह्यो 'कन्हैया'। कबहूँ प्रात न कियो कलेवा, साँझ न पीन्हीं धैया॥ बंसी बेनु सँभारि राखियो और अबेर सबेरो।…
पहिले करि परनाम नंद सों समाचार सब दीजो। और वहाँ वृषभानु गोप सों जाय सकल सुधि लीजो॥ श्रीदामा आदिक सब ग्वालन मेरे हुतो भेंटियो। सुख-संदेस सुनाय हमारो गोपिन को दुख मेटियो॥…