भोर की लालिमा
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Altın Yaprak
उत्साह का लाल चादर ओढ़े
ये भोर विभोर हो चली।
गुनगुनिती गीत सुनाती
चंचल पवन साथ अठखेलियां करती।।
हाय ये भोर की लालिमा
ललचाती मुझे हर सुबह सवेरे
की मार ही लूं गोते गहरे
उसके विशाल विश्वास के समुद्र में।।
और झाक ही लूं इस बार
उसके अंतः कारण की गलियों को
जो हर बार आमंत्रित करती मुझे
आ कही दूर चले सैर को।।
और प्रफुल्ली मेरा ये मन
मंद मुस्कान बिखेरते हुए
कदम रख ही देता उस संसार अनोखे में
और खुद को पाता लालिमा में रमा हुए।।
मानो जैसे लाल समुद्र में डुबकी मार
संतृप्ता सहित ताल से ताल मिलाते हुए
बहती हुई हवाओं को गले लगाते हुए
फिर से, हां फिर से जिंदगी की खिलखिलाहट को
मोतियों की माला में पिरो कर
गले की शोभा बनाकर
सीना ताने हुए चलता चला जा रहा
उस मंज़िल की ओर जिसे बुना था दोनों ने साथ।।
और सींचा था अपने सतरंगी प्यार से,
विरह की कराहती पीड़ा से, और
कभी न टालने वाला विश्वास से
जो विनाश की ज्वाला को पर कर।।
जीवन के शीतल स्वर्ग में
आपने पहले कदम रख चुकी।
इस भोर की लालिमा निराली में
हर बंधन तोड़ आज़ाद पंछी बन चली मैं।।
सुहावनी, शीतल, सुनहरी गलियां
सफल, सक्षम, सय्यमी बनाती परिस्थितियां
भोर की लालिमा रंगती जाति हमारी जिंदगियां
आशा, उत्साह, और उन्नति बेशूमार अनंत काल तक।।
भोर की लालिमा, हाय!
भोर की लालिमा......
© वर्षा मधुलिका
२४.०६.२०२१.
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