कहीं आगे ना निकल जाऊँ
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Altın Yaprak
वक़्त के दह्लीज पर मुददतें गूजार दी
वक़्त को अब भी डर है-
कहीं आगे ना निकल जाऊँ
परिंदो की ऊड़ान देख मैं भी ऊड़ने लगा,
अब परिंदो को डर है,
कहीं आगे ना निकल जाऊँ
सूरज तो मेरे क़िरदार का एक हिस्सा है,
हम दोनो जलते हैं, रोशनी के लिये,
सूरज को डर है कहीं सुरज ना हो जाऊँ
तू ने ना जाने कैसे छू दिया,
जिस्म टटोलता है, आंखे तलाशती हैं,
मुझे डर है, मैं कही तुम ना हो जाऊँ
जल में छेद करना मछलिओं से सीखा है,
मछलिओं को अब डर है-
मैं कही मछली ना हो जाऊँ
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