बरखा (अख्तर जवाद)
A Akhtar Jawad
0
Altın Yaprak
बादळ उठे और छा गए,
हलकी हलकी पड़ी फुआर,
सूर्यदेव कहाँ छुप गए
धुप उनके गले का हार
प्यासी धरती मुस्काई
थोड़ी थोड़ी थी लजाइ
य्रह दो पल जो मिले हैं आज
कैसी रीत और कैसा रिवाज
इस पेयार में इतनी लाज कहाँ
कल हो कहाँ आज जहाँ
बदरिया बोली बरसती हूँ
मैं भी मिलने को तरसती हूँ
मैं सबको घर में भेजती हूँ
कोई नहीं मैं देखती हूँ
य्रह दो पल जो मिले हैं आज
कैसा धर्म और कैसा समाज
सूर्यदेव कर लो जी भर के पेयार
धुप को चांदनी बनाना है
मैं इंद्रधनुष का लूं गी आकार
मुझे भी साजन को मनाना है
मैं भी तो पयास की मारी हूं
मैं एक पयासी नारी हूं
य्रह दो पल जो मिले हैं आज
मैं पेयार की पढ़ने चली नमाज
Bu şiiri puanla
Henüz puan verilmemiş