راجکماریराजकुमारी

A Akhtar Jawad
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سنسار میں آئ تھی میں ایک سریلی دستک پر ناری کا جب جنم لیا دادی ماں کے مستک پر ابھر گیئں تھیں شکنیں کئ شاید میرا نام تھا یہ میں جسکو پڑھ نہ سکی ایک دکھت پیغام تھا یہ بہنیں تیری کیا کم تھیں اچھا چلو ایک اور سہی کیا رکھوں میں نام تیرا راجکماری کور سہی گوری ہے سندر ہے پتر کی پیاری پتری ہے مکھن جیسی کھال کتنی صاف اور ستھری ہے کوئ کنہیا چرا نا لے واہ گرو اسے بھائ دے خسرو کا گیت ہے یہ سر دے اسے شہنائ دے بڑی ہوئ گلی سے گزری گبرو آہیں بھرنے لگے ایک نہیں کئ منڈے میری چال پہ مرنے لگے سارے باتیں کرتے تھے نا جانے کیا نام ہے اسکا سکھا سنگھ کی بہنا ہے نکڑ والا دھام ہے اسکا رانجھا میرا آ پہنچا اور میں نے لے لی نئ انگڑائ میری اٹاری پر پیپل کے نیچے بجنے لگی سر شہنائ پالکی پی کے دوارے پہنچی تو سب یہ کہنے لگے بلدیو سنگھ کی وھٹی ہے مجھے اچھے اپنے گہنے لگے قمیض سنہرے تاروں والی ریشمی میرا لاچا تھا گھوڑے پر تھا سجنا میرا آگے آگے باجا تھا جسم تھا میرا ایک کویتا دل کوی بنا اس رات میں کویتائیں لکھنے لگی ہر رت میری بنی برسات اب چٹھیاں آتی رہتی ہیں تو رل کو میرے آرام ملا کویتاؤں کے سنگھاسن پر مجھکو میرا نام ملا پھر میرے شریر کا ایک ٹکڑہ الگ ہوا پر جدا نہیں خدا سے پیارا لگتا ہے گو بیٹا ہے وہ خدا نہیں گرونام سنگھ کی ماں کہلائ کھو گیا پھر میرانام راجکماری رات کی ہوں میں ماں ہوں لیکن صبح و شام संसार में आई थी वहएक सुरीली दस्तक पर उभर गई थीं कई शिकनें दादी मां के मस्तक पर वह जिसको पढ़ नहीं पाई एक दुखित पैग़ाम था यह उभर गई थीं जोशिकनें शायद इसका नाम था यह बहनें तेरी कया कम थीं अच्छा चलो एक और सही कया रखूँ मैं नाम तेरा राजकुमारी कौर सही गोरी है सूंदर है पुत्तर की पयारी पुत्री है माखन जैसी खाल कितनी साफ और सुथरी है कोई कन्हैया चुरा नाले वाह गुरु इसे भाई दे खुसरो का गीत है यह सुर दे इसे शहनाई दे बड़ी हुई गली से गुज़री गबरू आहें भरने लगे एक नहीं कई मुंडे चालपह इसकी मरने लगे सारे बातें करते थे ना जाने कया नाम है इसका सूखा सिंह दी बहना है नुक्कड़ वाला धाम है इसका राँझा इसका आ पहुंचा और इसने ने ले ली नई अंगड़ाई ऊंची अटारी पीपल के नीचे बजने लगी शहनाई पालकी पी के द्वारे पहुंची तो सारे यह कहने लगे बलदेव सिंह दी दुल्हन है यह इसे अच्छे अपने गहने लगे कमीज सुनहरे तारों वाली रेशमी इसका लाचा था घोड़े पर था सजना इसका आगे आगे बजा था जिस्म था इसका एक कविता दिल कवी बना उस रात वह कविताएं लिखने लगी हर रुत उसकी बानी बरसात अब चिठ्ठिआं आती रहती हैं इसके मन को आराम मिला कविताओं के सिंघासन पर इस को इसका नाम मिला फिर इसके शरीर का एक टुकड़ा अलग हुआ पर जुदा नहीं खुदा से पेयारा लगता है बेटा है जो खुदा नहीं गुरुनाम सिंह की मां कहलाई खो गया फिर इसका नाम राजकुमारी रात की है मां हैलेकिन सुबहो शाम

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