कैदी नंबर ४२० Kaidi
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Altın Yaprak
कैदी नंबर ४२०
साहब की आँखों में आँसू
पर थे मगरमच्छ के आँसू
चिंता मन में लगी हुई थी
निवृत्ति की तारीख पक्की हो गई थी।
कैसे कटेगी ये जिंदगी?
यदि लग गई बिमारी तो!
मन व्याकुल हो रहां था
मन कुंठित सा महसूस कर रहा था।
ये गाडी, ये बँगला
बहार के लोगों का लगा रहता था जमेला
कोई कुछ लेके आता
तो कोई मोटा नजराना दे जाता।
तनख्वाह तो बची रहती
पर फिर भी चिंता सताती
उसका क्या होगा जिसको तहखाने में छिपाके रखी है
अभी उसका गिनना और कयास लगाना बाकी है।
जेवर, पैसा और हुंडिया
जय बोलो इंडिआ
अब में भोगूँगा सुख से!
आफत नहीं आएगी कहीं से।
'टक टक ' आवाज सुनकर में सचेत हो गया
कहीं घर पे छापा तो नही पड गया
मैंने धीरे से दरवाजा खोला
देखते ही देखते सब तोड़ने लगे ताला।
सब सपने टूट गए
ये आयकर वाले जालिम कहाँ से आ गए
मेरी सब पूंजी पर सरकारी सील मार गए
में होते ही मेरी कबर का इंतजाम कर गए।
'किसी ने खूब कहा था'
मैंने भी उसे सुन रखा था
आज देखभी लिया और अनुभव भी हो गया
पाप की कमाई का आज अंत हो गया।
'कैदी नंबर ४२० ' मुझे जेल अधीक्षक बुला रहे थे
कैदी का पहनावा मुझे देने जा रहे थे
मुझे पसीना छूट गया
जीते जी मानो मैतो मर गया।
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