कैदी नंबर ४२० Kaidi

M Mehta Hasmukh Amathaal Mehta Hasmukh Amathaal
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कैदी नंबर ४२० साहब की आँखों में आँसू पर थे मगरमच्छ के आँसू चिंता मन में लगी हुई थी निवृत्ति की तारीख पक्की हो गई थी। कैसे कटेगी ये जिंदगी? यदि लग गई बिमारी तो! मन व्याकुल हो रहां था मन कुंठित सा महसूस कर रहा था। ये गाडी, ये बँगला बहार के लोगों का लगा रहता था जमेला कोई कुछ लेके आता तो कोई मोटा नजराना दे जाता। तनख्वाह तो बची रहती पर फिर भी चिंता सताती उसका क्या होगा जिसको तहखाने में छिपाके रखी है अभी उसका गिनना और कयास लगाना बाकी है। जेवर, पैसा और हुंडिया जय बोलो इंडिआ अब में भोगूँगा सुख से! आफत नहीं आएगी कहीं से। 'टक टक ' आवाज सुनकर में सचेत हो गया कहीं घर पे छापा तो नही पड गया मैंने धीरे से दरवाजा खोला देखते ही देखते सब तोड़ने लगे ताला। सब सपने टूट गए ये आयकर वाले जालिम कहाँ से आ गए मेरी सब पूंजी पर सरकारी सील मार गए में होते ही मेरी कबर का इंतजाम कर गए। 'किसी ने खूब कहा था' मैंने भी उसे सुन रखा था आज देखभी लिया और अनुभव भी हो गया पाप की कमाई का आज अंत हो गया। 'कैदी नंबर ४२० ' मुझे जेल अधीक्षक बुला रहे थे कैदी का पहनावा मुझे देने जा रहे थे मुझे पसीना छूट गया जीते जी मानो मैतो मर गया।

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