मिली है जन्नत Mili Hai

M Mehta Hasmukh Amathaal Mehta Hasmukh Amathaal
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मिली है जन्नत हम तो ठहरे फ़क़ीर पर है अमीर मन के भी तन के भी लगा देते है दौड़ पर नहीं करते होड़ दोस्ताना फर्ज समझते है सबको अपना मानते है कोई लकीर नहीं बीच में नहीं सोचते ऊंच और नीच में मुझे बहुत फाता है उनके बीच जाकर नजरे ईनायत हो जाती है मिलकर। मुझे कई बात पूछते रहते है 'क्यों उदास रहते हो भाई ' मुझे बार बार पूछते है में नहीं टटोलने देता मेरा मन बस मुरजाया सा रहता है वदन। पर एक अजीब सा है आनंद उनकी बातों में होता है व्यंग मस्ती और बेफ़िक़राई की जंग हम मिला देते है उसमे दोस्ती का रंग कोई नहीं करता किसीकी अवमानना सब को होता है मत अपना अपना। पड़ता है सब का सुनना यही तो है मौक़ा अपनी ही बातक मजा उड़ाना एक ही तो मिली है जन्नत हम सब है उसमे मस्त बस मिला है प्यार तो लुफ्त उठाते है फोगट में मिला यार तो मुफ्त में साथ सफर करते है। ना हो हम जुदा किसी हाल में बीते समय इसी सुरते हाल में मस्ती अपनी जगह हो दोस्ती भी अपनी जगह रहे हम सब एक रहे धरती की सतह पर बस हमारे पाँव रहे।

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