मिले कोई आशियाना ... Mile
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Altın Yaprak
मिले कोई आशियाना
सोमवार, ३० जुलाई २०१८
चाहा हमनेमिले कोई आशियाना
यही तो थी हमारी दिली तमन्ना
हमने कभीनहीं किया मना
बस कभी हाँ में उत्तर नहीं सूना।
जमीं तो थी ही उपजाऊ
पर उसमे कैसे उगाऊ?
कैसे दिली तमन्ना को बताऊँ?
पर सोच लिया जी अबकी बार उसे जताऊ।
हिम्मत कर के दिली दानों को मुठी में बंध कर लिया
जमीं ताज़ी ही हुई थी गीली सो बो दिया
पर मन में एक लकीर सी खिंच ली
जमीं को मन ही मनसींच ली।
सोचा प्यार जरूर पनपेगा
मन में उमंग जरूर जगाएगा
छोटा पौधा जोर उभर आएगा
हमारे प्यार की कहानी दोहराएगा।
लग तो रहा है
सपना पूरा हो रहा है
वो भो धीरे से कान में फुसला रही है
लगता है मेरी मन्नत भी पूरी हो रही है।
कई दिनों से चाह बढ़ रही थी
वो भी हमें बहका रही थी
अपने मन का भेद नहीं बता रही थी
पर होले होले से मनका भाव जता रही थी।
हसमुख अमथालाल मेहता
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