मन में शक.. Manme
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Altın Yaprak
मन में शक
मंगलवार, २६ जून २०१८
आदतन हूँ मजबूर
पर हूँ बेकसूर
चाहा तो है पर
नहीं रुकते मेरे पैर।
कैसे कहूं?
पर क्यों ना कहूं?
तुम तो बसी हो खून के कण कण में!
कंपकंपी आ जाती है तनबदन में।
अल्फाज नहीं निकलते मुंह से
आँखे नहीं सुहाती किसी और से
बस एक ही लगन
कर देती है मुझे मगन।
इशारा तो हो जाता है
दिल को समझाता है
सबुरी ही इसका समाधान है
प्रेम ही आधार, ही सन्मान है।
क्या कहा था तूने?
कहीं भी ले चल मुझे
रूखी सुखी रोटी भी खा लुंगी
अपना जीवन साथ मे बिता दूंगी।
में ना ही सो पाता हूँ और नाही जग सकता हूँ
आसमान की और देखकर सोचता रहता हूँ
क्या धरती और आसमान का मिलना शक्य है?
हाँ तो फिर मेरे मन में शक क्यों है?
हसमुख अमथालाल मेहता
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