चलता था धीरे-धीरे वह एक यात्रियों का दल , सरिता के रम्य पुलिन में गिरिपथ से, ले निज संबल । था सोम लता से आवृत वृष धवल, धर्म का प्रतिनिधि , घंटा बजता तालों में उसकी थी मंथर गति-विधि…
उषा सुनहले तीर बरसती जयलक्ष्मी-सी उदित हुई, उधर पराजित कालरात्रि भी जल में अंतर्निहित हुई । वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का आज लगा हँसने फिर से , वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में शरद-विक…
पल भर की उस चंचलता ने खो दिया हृदय का स्वाधिकार , श्रद्धा की अब वह मधुर निशा फैलाती निष्फल अंधकार! मनु को अब मृगया छोड़ नहीं रह गया और था अधिक काम , लग गया रक्त था उस मुख में--हिंस…
"मधुमय वसंत जीवन-वन के, वह अंतरिक्ष की लहरों में, कब आये थे तुम चुपके से रजनी के पिछले पहरों में? क्या तुम्हें देख कर आते यों मतवाली कोयल बोली थी? उस नीरवता में अलसाई कलियों ने आंख…
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह, एक पुरुष, भींगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह। नीचे जल था ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन, एक तत्व की ही प्रधानता-कहो उसे जड़ या…
उषा सुनहले तीर बरसती जयलक्ष्मी-सी उदित हुई, उधर पराजित कालरात्रि भी जल में अंतर्निहित हुई । वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का आज लगा हँसने फिर से , वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में शरद-विक…