आनंद

J Jaishankar Prasad
0 Altın Yaprak
चलता था धीरे-धीरे वह एक यात्रियों का दल , सरिता के रम्य पुलिन में गिरिपथ से, ले निज संबल । था सोम लता से आवृत वृष धवल, धर्म का प्रतिनिधि , घंटा बजता तालों में उसकी थी मंथर गति-विधि । वृष-रज्जु वाम कर में था दक्षिण त्रिशूल से शोभित , मानव था साथ उसी के मुख पर तेज अपरिमित । केहरि-किशोर से अभिनव अवयव प्रस्फुटित हुए थे , यौवन गंभीर हुआ था जिसमें कुछ भाव नये थे , चल रही इड़ा भी वृष के दूसरे पार्श्व में नीरव । गैरिक-वसना संध्या - सी जिसके चुप थे सब कलरव । उल्लास रहा युवकों का शिशु गण का था मृदु कलकल , महिला-मंगल-गानों से मुखरित था वह यात्री दल । चमरों पर बोझ लदे थे वे चलते थे मिल अविरल , कुछ शिशु भी बैठ उन्हीं पर अपने ही बने कुतुहल । माताएँ पकड़े उनको बातें थीं करती जातीं , 'हम कहाँ चल रहे' यह सब उनको विधिवत समझातीं । कह रहा एक था, "तू तो कब से ही सुना रही है-- अब आ पहुँची लो देखो आगे वह भूमि यही है । पर बढ़ती ही चलती है रुकने का नाम नहीं है , वह तीर्थ कहाँ है कह तो जिसके हित दौड़ रही है? "वह अगला समतल जिस पर है देवदारु का कानन , घन अपनी प्याली भरते ले जिसके दल से हिमकन । हाँ, इसी ढालवें को जब बस सहज उतर जावें हम , फिर सम्मुख तीर्थ मिलेगा वह अति उज्ज्वल पावनतम ।" वह इड़ा समीप पहुँच कर बोला उसको रुकने को , बालक था, मचल गया था कुछ और कथा सुनने को । वह अपलक लोचन अपने पादाग्र विलोकन करती । पथ-प्रदर्शिका-सी चलती धीरे-धीरे डग भरती । बोली, "हम जहाँ चले हैं वह है जगती का पावन-- साधना प्रदेश किसी का शीतल अति शांत तपोवन ।" "कैसा? क्यों शांत तपोवन? विस्तृत क्यों नहीं बताती", बालक ने कहा इड़ा से वह बोली कुछ सकुचाती-- "सुनती हूँ एक मनस्वी था वहाँ एक दिन आया , वह जगती की ज्वाला से अति-विकल रहा झुलसाया । उसकी वह जलन भयानक फैली गिरी अंचल में फिर , दावाग्नि प्रखर लपटों ने कर दिया सघन वन अस्थिर । थी अर्धांगिनी, उसी की जो उसे खोजती आयी , यह दशा देख, करुणा की--वर्षा दृग में भर लायी । वरदान बने फिर उसके आँसू, करते जग-मंगल , सब ताप शांत होकर, वन हो गया हरित, सुख-शीतल । गिरि-निर्झर चले उछलते छायी फिर से हरियाली , सूखे तरु कुछ मुसक्याये फूटी पल्लन में लाली । वे युगल वहीं अब बैठे संसृति की सेवा करते , संतोष और सुख देखकर सब की दुःख-ज्वाला हरते । है वहाँ महाहृद निर्मल जो मन की प्यास बुझाता , मानस उसको कहते हैं सुख पाता जो है जाता।" "तो यह पृष क्यों तू यों ही वैसे ही चला रही है, क्यों बैठे न जाती इस पर अपने को थका रही है?" "सारस्वत-नगर-निवासी हम आये यात्रा करने यह व्यर्थ, रिक्त-जीवनघट पीयूष-सलिल से भरने । इस वृषभ धर्मप्रतिनिधि को उत्सर्ग करेंगे जाकर , चिर-मुक्त रहे यह निर्भय स्वच्छंद सदा सुख पाकर ।" सब सम्हल गये थे आगे थी कुछ नीची उतराई , जिस समतल घाटी में, वह थी हरियाली से छाई । श्रम, ताप और पथ-पीड़ा क्षण भर में ये अंतर्हित , सामने विराट धवल-नग अपनी महिमा से विलसित । उसकी तलहटी मनोहर श्यामल तृण-वीरुष वाली , नव-कुंज, गुहा-गृह सुंदर हृद से भर रही निराली । वह मंजरियों का कानन कुछ अरुण पीत हरियाली , प्रति-पर्व सुमन-संकुल थे छिप गयी उन्हीं में डाली । यात्री दल ने रुक देखा मानस का दृश्य निराला , खग-मृग को अति सुखदायक छोटा-सा जगत उजाला । मरकत की वेदी पर ज्यों रक्खा हीरे का पानी , छोटा-सा मुकुर प्रकृति या सोयी राका रानी । दिनकर गिरि के पीछे अब हिमकर था चढ़ा गगन में , कैलास प्रदोष-प्रभा में स्थिर बैठा किसी लगन में । संध्या समीप आयी थी उस सर के, वल्कल-वसना , तारों से अलक गूँथी थी पहने कदंब की रसना । खग कुल किलकार रहे थे, कलहंस कर रहे कलरव , किन्नरियाँ बनीं प्रतिध्वनि लेती थीं ताने अभिनव । मनु बैठे ध्यान-निरत थे उस निर्मल मानस-तट में सुमनों की अंजलि भर कर श्रद्धा थी बड़ी निकट में। श्रद्धा ने सुमन बिखेरा शत-शत मधुपों का गुजन, भर उठा मनोहर नभ में मनु तन्मय बैठे उन्मन। पहचान लिया था सब ने फिर कैसे अब वे रुकते , वह देव-द्वंद्व त्रुतिमय था फिर क्यों न प्रणति में झुकते । तब वृषभ सोमवाही भी अपनी घंटाध्वनि कर्ता, बढ़ चला इड़ा के पीछे मानव भी था डग भरता। हाँ इड़ा आज भूली थी पर क्षमा न चाह रही थी। वह दृश्य देखने को निज दृग-युगल सराह रही थी । चिर-मिलित प्रकृति से पुलकित वह चेतन-पुरुष-पुरातन , निज-शक्ति-तरंगायित था आनंद-अंबु-निधि शोभन । भर रहा अंक श्रद्धा का मानव उसको अपना कर, था इड़ा शीश चरणों पर वह पुलक भरी गद्गद स्वर-- बोली—मैं धन्य हुई हैं जो यहाँ भूलकर आयी, हे देवि! तुम्हारी ममता बस मुझे खींचती लायी। भगवति, समझी मैं! सचमुच कुछ भी न समझ थी मुझको । सब को ही भुला रही थी अभ्यास यही था मुझको। हम एक कुटुब बना कर यात्रा करने हैं आये , सुन कर यह दिव्य-तपोवन जिसमें सब अघ छूट जाये ।" मनु ने कुछ-कुछ मुसक्या कर कैलास ओर दिखलाया , बोले, "देखो कि यहाँ पर कोई भी नहीं पराया। हम अन्य न और कुटुंबी हम केवल एक हमीं हैं , तुम सब मेरे अवयव हो जिसमें कुछ नहीं कमी है। शापित न यहाँ है कोई तापित पापी न यहाँ है , जीवन-वसुधा समतल है समरस है जो कि जहाँ है । चेतन समुद्र में जीवन लहरों - सा बिखर पड़ा है , कुछ छाप व्यक्तिगत, अपना निमित आकार खड़ा है । इस ज्योत्स्ना के जलनिधि में बुदबुद - सा रूप बनाये, नक्षत्र दिखाई देते अपनी आभा चमकाये। वैसे अभेद-सागर में प्राणों का सृष्टि-क्रम है , सब में घुल-मिल कर रसमय रहता यह भाव चरम है। अपने दुःख-सुख से पुलकित यह मूर्त्त-विश्व सचराचर , चिति का विराट्-वपु मंगल यह सत्य सतत चित सुन्दर। सबकी सेवा न परायी वह अपनी सुख-संसृति है , अपना ही अणु-अणु कण-कण द्वयता ही तो विस्मृति है । मैं की मेरी चेतनता सबको ही स्पर्श किये सी सब भिन्न परिस्थितियों की है सादक घूंट पिये सी । जग ले ऊषा के दृग में सो ले निशि की पलकों में , हाँ स्वप्न देख ले सुंदर उझलन वाली अलकों में-- चेतन का साक्षी मानव हो निर्विकार हँसता-सा , मानस के मधुर मिलन में गहरे-गहरे धँसता-मा। सब भेद-भाव भुलवा कर दुःख-सुख को दृश्य बनाता , मानव कह रे! यह मैं हूँ, यह विश्व नीड़ बन जाता!" श्रद्धा के मधु-अधरों की छोटी-छोटी रेखाएँ , रागारुण किरण कला-सी विकसीं बन स्मिति लेखाएँ। वह कामायनी जगत की मंगल-कामना-अकेली , थी-ज्योतिष्मती प्रफुल्लित मानस तट की वन वेली । वह विश्व-चेतना पुलकित थी पूर्ण-काम की प्रतिमा , जैसे गंभीर महाहृद हो भरा विमल जल महिमा । जिस मुरली के निस्वन से यह शून्य रागमय होता , वह कामायनी विहंसती अग जग था मुखरित होता । क्षण-भर में सब परिवर्त्तत अणु - अण थे विश्व-कमल के , पिंगल-पराग से मचले आनंद-सुधा-रस छल के । अति मधुर गंधवह बहता परिमल बूँदों से सिंचित , सुख-स्पर्श कमल-केसर का कर आया रज से रंजित। जैसे असंख्य मुकलों का मादन-विकास कर आया। उनके अछत अधरों का कितना चुंबन भर लाया। रुक-रुक कर कुछ इठलाता जैसे कुछ हो वह भूला , नव कनक-कुसुम-रज धूसर मकरंद - जलद - सा फूला। जैसे वनलक्ष्मी ने ही बिखराया हो केसर-रज , या हेमकूट हिम जल में अलकाता परछांई निज। संसृति के मधुर मिलन के उच्छ्वास बना कर निज दल , चल पड़े गगन-आँगन में कुछ गाते अभिनव मंगल । वल्लरियाँ नृत्य निरत थीं, बिखरी सुगंध की लहरें , फिर वेणु रंध्र से उठ कर मूर्च्छना कहाँ अब ठहरे। गूँजते मधुर नूपुर से मदमाते होकर मधुकर , वाणी की वीणा-ध्वनि-सी भर उठी शून्य में मिलकर। उन्मद माधव मलयानिल दौड़े सब गिरते-पड़ते , परिमल से चली नहा कर काकली, सुमन थे झड़ते। सिकुड़न कौशेय वसन की थी विश्न-सुंदरी तन पर , या मादन मृदुतम कंपन छायी संपूर्ण सृजन पर। सुख-सहचर दुःख-विदूषक परिहास पूर्ण कर अभिनय । सब की विस्मृति के पट में छिपा बैठा था अब निर्भय। थे डाल-डाल में मधुमय मृदु मुकुल बने झालर से , रस का भार , प्रफुल्ल सुमन सब धीरे-धीरे से बरसे। हिम खंड रश्मि मंडित हो मणि-दीप प्रकाश दिखाता , जिनसे समीर टकरा कर अति मधुर मृदंग बजाता । संगीत मनोहर उठता मुरली बजती जीवन की । संकेत कामना बन कर बतलाती दिशा मिलन की । रश्मियाँ बनीं अप्सरियाँ अंतरिक्ष में नचती थीं , परिमल का कन-कन लेकर निज रंगमच रचती थीं। मांसल-सी आज हुई थी हिमवती प्रकृति पाषाणी । उस लास-रास में विह्वल थी हँसती-सी कल्याणी। वह चंद्र किरीट रजत-नग स्पंदित-सा पुरुष पुरातन, देखता मानसी गौरी लहरों का कोमल नर्त्तन। प्रतिफलित हुई सब आँँखें उस प्रेम-ज्योति-विमला से, सब पहचाने-से लगते अपनी ही एक कला से। समरस थे जड़ या चेतन सुंदर साकार बना था, चेतनता एक विलसती आनंद अखंड घना था।

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Metnin kaynağı: Kamu malı arşiv

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