Kuch Sher - 10 (In Hindi/Urdu)
M
0
Altın Yaprak
शाख़ पर बैठा एक परिंदा हूँ मैं
लम्बे सफर से लौटा एक बंदा हूँ मैं
क्या शिकार करोगे अब तुम मेरा
हवा के झोके से ही गिर जाऊँगा
अँधियों ने कई चराग़ बुझाये है
फिर भी दीये कहाँ बाज़ आये हैं
अपनी ज़िद में मैं खुद जल जाऊँगा
ज़िन्दगी से गया तो ख्यालों में आऊँगा
Bu şiiri puanla
Henüz puan verilmemiş