और तुम आई
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Altın Yaprak
लहरों पर बैठकर आओगी तुम इस उम्मीद में
मैं चट्टान बन साहिल पर
लहरों की मार खाता रहा
जंगल से शायद गुज़रोगी तुम
इस उम्मीद में मैं हर दरख़्त के पत्तों
पर नाम तेरा लिखता रहा
प्यास से तड़पकर तुम शायद
पानी ही पीने आ जाओ इस उम्मीद में मैं
नदी बन बहता ही रहा
बगिया में शायद तुम फूल लेने ही आ जाओ
इस उम्मीद में मैं भंवरा बन
कलियों को फूल बनाता रहा
उड़नखटोले पर सवार शायद तुम
गगन की सैर को आ जाओ इस उम्मीद में मैं
पंछी बन बादलों से टकराता रहा
सपनो में तुम शायद दुल्हन बन कर आजाओ
इस उम्मीद में मैं हरदम सज और सवर कर
गहरी नींद सोता रहा
और तुम आई- कब, कैसे और कहाँ से
पता चल न सका मुझको, सभी सोच रुक गयी
आँखों में चमक आई तुम्हे देख साँसे आई
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