प्रेम का यह जुलूस
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Altın Yaprak
रात चांदनी बिखेर रही थी
शबनम की बूंदे धरती को भिगो रही थी
तारों की बरात के बीच दो दिल
भीड़ से दूर, किसी तालाब के किनारे
टिम टिमाते जुगनू को निहार रहे थे
ऐसा लगता था मनो चारो ओर प्रेम ही प्रेम बरस रहा है
धरती के सभी प्राणी प्रेम में तृप्त,
संतोष का एहसास कर रहे थे
रात भी अपने में मस्त, मस्ती में नाच रही थी
आँखों ने ऐसा समां पहले कभी नहीं देखा था
मन कोइतनी शांति कभी नहीं मिली थी
जीवन इतना आनंदित पहले कभी नहीं हुआ था
लगा जैसे वक़्त यही रुक जाये सदा के लिए
और मैं कामना करता हूं कि
प्रेम का यह जुलूस अनंत काल तक
हमेशा-हमेशा तक चलता रहे
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