दिल्ली में (Hindi)
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Altın Yaprak
ग़ज़ल: दिल्ली में
किसी की देखिये कश्ती पड़ी मंझधार दिल्ली में
किसी इन्सान का सपना हुआ साकार दिल्ली में
बहुत से लेके खाली हाथ खाली पेट थे आये
बने बैठे हैं कितने ठाठ से ज़रदार दिल्ली में
हज़ारों लोग अपने हाथ की रेखाओं के सदके
चले आते हैं बेखटके दयानतदार दिल्ली में
अभी कुछ ही दिनों से रोज प्रातःकाल लाते हैं
खबरें रक्त-रंजित दिलजले अखबार दिल्ली में
हुआ था आज तक ऐसा नहीं विश्वास का टोटा
सुरक्षित न कोई वासी न ही घरबार दिल्ली में
दरिंदे जब से हैं बेख़ौफ़ गली, कूचों में, राहों में
लहू से है सना हर रोज का अखबार दिल्ली में
जगह कोई भी हो इज्ज़त कहीं भी लूट लेते हैं
बस हो, मेट्रो हो या हो चलती कार दिल्ली में
सशंकित हैं सभी माता पिता बच्चे व नर-नारी
कदाचित खो गया है प्यार का संसार दिल्ली में
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Faridabad, Haryana, India
February,12,2015
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