बरसों पहले….. (Long Time Back)

S Savita Tyagi
0 Altın Yaprak
बरसों पहले….. बरसों पहले का एक वो ज़माना था हुस्नो अन्दाज़ अपना लाजवाब था । साज़ के छिड़ते ही पैर थिरकते थे और दिल दिवाना मचलता था । पायल बजती थी, घुगंरू छनकते थे चूड़ी की छमछम से गीत निकलते थे । चेहरे से जब हम ज़ुल्फ़ें हटाते थे घटाऔं के पीछे से चाँद निकलता था । हँसी में हमारी मोती बरसते थे कजरारे नयनों से जाम छलकते थे । चलते थे तब हम सागर की लहरों पर चाहतों से अपनी तूफ़ान उमड़ते थे । शामें हमसे पूछ कर करवटें बदलती थी सासों की गरमी से शमा पिघलती थी । वाक़िफ़ थे कुछ कुछ वजाहत से अपनी यों अॉंचल उड़ा कर हवाओं को बाँधते थे । मासूम थे तब नादान भी कितने कि तोहफे ये तुम पर लुटाने चले थे । नहीं ये पता था कि क्या दे रहे हैं ठुकरा के जिसको वो रुखसत हुए थे । जिन्दगी की राह में फिर वो हमदम मिले हैं घङी साथ में कुछ बिताने चले हैं । पूछते हैं अक्सर वो कैसा जमाना था दिल हमने उनको देना जब चाहा था । एहसास अब क्यों वो हमको दिलाते हैं खोया है कुछ जो माँगना चाहते हैं । भोले हैं कितने नादान हैं कितने ये क्या चाहते हैं ये क्या माँगते हैं ।। 12.30.2000

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