यादें
S Savita Tyagi
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Altın Yaprak
किसे याद रखें किसे भूल जायें
अपनों के बीच क्यों ये गैर याद आयें
जानी पहचानी थी वो छोटी सी दुनियॉ
बाबुल का अंगना और सखियों की गलियॉ
वक्त ने बदल ली हमसे छुप के करवट
अजनबी हैं रास्ते अब अजनबी हैं वादियाँ
किसे पहचाने किसे हम बुलायें
धुधंली सी पड़ गयी हैं रिश्तो की कहानियाँ
अपनी समझ के गली में बढ़े कदम
भूल गये ठौर पर वो सांकलें चढ़ी थी बन्द
किससे नजर मिलायें गुफ्तगू करें कहँा
बचपना तो खो गया बेजार हैं जवानियाँ
भटकते रहे घन्टो पीरे दरगाह पर
सजदे किये हजारों मन्नतें भी माँगी
फिर भी नजर न आया वो नूरानी चेहरा
देखते थे जिसको दियो की कतार में
घड़ी थाम के हम तो बैठे थे कबसे
दामन में चाहा था वक्त को छुपाना
खुद ही छुप रहे हैं अब ढलती शाम के संग
धुधंलुका घिरा कब ये नही हमने जाना
कैसी दिवाली कैसी वो होली
रगं पुराने हैं यादों में समाये
पहचान सकते तो पहचान लेते
मगर चढ़ चुके हैं ऐ वतने माटी
तुझ पर भी मुझ पर भी रंग कुछ पराये
किसे याद रक्खे किसे भूल जायें
अपनो के बीच क्यों ये गैर याद आयें ।
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