अकेली चाह से कुछ नहीं बनता.. Akeli Chaah
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Altın Yaprak
अकेली चाह से कुछ नहीं बनता
भागते रहे तुम जिस्मानी सौंदर्य के पीछे
जिसके छींटे लगते रहे नाम के पीछे
बेकार में बदनामी झेलते रहे
बस जीस्म के साथ खिलवाड़ ही करते रहे।
हर कोई जान ने लगा आप क्या है?
आपके जीवन में प्रेम का वास्ता क्या है?
किसी को विश्वास नहीं आ रहा आपके लब्ज़ो पर
सब चुराने लगे नजरे आपके कर्मो पर।
जैसे शराबी पिता है अमृत पेड़ के नीचे
भले ही वो निकाले बोल सच्चे
उसको लोग इसनासियत के नामपर कहेंगे धब्बा
सब लोग कहेंगे नहीं जायेंगे उसके पास 'नारे बाबा '
आरज़ू के साथ सही मंशा आवश्यक है
यदि आदमी खरा और वयस्क है
कुछ चीजें अपने आप बयाँ हो जाती है
ना कहने की चाह हो फिर भी होठों पे आही जाती है।
दिल चाहता हो आसमान लांगने को
चाँद के साथ मस्ती करने को और प्रेम करने को
पर अकेली चाह से कुछ नहीं बनता
आदमी को अपने आप सके अनुरूप ढालना पड़ता।
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