एक कविता - ज़िन्दगी के नाम
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Altın Yaprak
न समझा है कोई, और न समझ सकेगा
ये ज़िन्दगी के दरया में मौजों का उठना
ये रवानी किस लिए और कब तक
ये कहानी किसकी और क्यों कर
गए हम से पहले कई ख़ाक में
खुश होकर और तकलीफ सहकर
तो क्या हुआ जाना था उन्हें और हम भी जायेंगे
जो शरीर मिला है उसका इस्तेमाल कर के जायेंगे
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