जीवन से परे
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Altın Yaprak
अस्त होता सूर्य और आकाश में चमता सितारा
क्या यह स्पष्ट बुलावा नहीं!
और जब मै समुद्र से मिल जाऊँगा
न कोई शोर न शराबा होगा
समुद्र में उठती लहरें एक दम शांत लगने लगेगी
आवाज़ और झाग से भरी हुई
जैसे बहुत गहरायी से निकली हुई
और अब घर को लौट चली
गोधूलि और संध्या की बजती घण्टियाँ,
इसके बाद होता अँधेरा
अब शायद मेरे जाने का कोई दुःख न होगा
जब मै अनंतकाल चला जाऊँगा
हालांकि मौत कि बाढ़ मुझे दूर ले जाएगी
शोक के समय और स्थान से
वहां, जहाँ मै अपने ईश्वर से रूबरू होगा
इस जीवन को त्याग कर.
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