कब तक
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Altın Yaprak
आँखों में आंसू
मांगते हाथ
झुकी हुई निगाहें, कब तक
मायूसी चेहरे पे
ग़म से बुरा हाल
ये शर्मिंदगी, कब तक
ऐसे तो न थे ये हालात
कभी चले थे साथ साथ
अब ये जुदाई , कब तक
हसरत से भरी निगाहें
क्यों चाहे हर शय यहाँ
ये अधूरी चाहत , कब तक.
मंज़िल सामने है
राह साफ़ नज़र आये
ये इंतज़ार, कब तक.
Bu şiiri puanla
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