सिलसिला
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Altın Yaprak
मनाना हमें नहीं आता, मानना उन्हें नहीं आता
ये सिलसिला-ए-गुफ्तगू, जारी है
कभी आँखों से छलकती है कभी होठों को दांतों से दबाते है
ये सिलसिला-ए-नाराज़गी, जारी है
छुपा भी नहीं सकते दिल की बात - बता भी नहीं सकते
ये सिलसिला-ए -कश्मकश, जारी है
उठते हैं कभी, कभी बैठ जाते हैं
ये सिलसिला-ए-बेचैनी, जारी है
देखते हैं कभी, कभी छुप जाते हैं
ये सिलसिला-ए-इश्क़ आँखों से, जारी है
गिनते हैं तारे कभी, कभी नींद से जी चुराते हैं
ये सिलसिला-ए-शब, जारी है
वो बांधते हैं फिर खोल देते हैं
ये सिलसिला-ए-ज़ुल्फ़ की कशिश, जारी है
रिश्तों के ताने बाने कहीं, कहीं दोस्ती की मिसाल
ये सिलसिला-ए-दराज़, जारी है
बचपन से जवानी तक और जवानी से बुढ़ापे तक
ये सिलसिला-ए-क़ैद-ए-हयात, जारी है
कहीं जिस्म की ख्वाहिश, कहीं रूह की तमन्ना
ये सिलसिला-ए- मस्लहत, जारी है
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