अधम बचन तैं को फल्यो, बैठि तार की छाहिं रहिमन काम न आवहीं, जे नीरस जग माहिं
अनुचित-उचित रहीम लघु, करहिं बड़ेन के जोर ज्यों ससि के संयोग तैं, पचवत आगि चकोर
अनुचित बचन न मानिए, यदपि गुराइस गाढ़ि है रहीम रघुनाथ तैं, सुजस भरत को बाढ़ि
अमर बेलि बिन मूल की, प्रति-पालत है ताहि रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि
यत्पादपङ्कजरेणोः प्रसादमासाद्य सर्वभुवनेषु। प्रणमामीष्टसुमूर्तिं तामहममराः प्रभुत्वतां यान्ति॥१॥ कमर्विलाधशालए नरोहि बामुरौवतः। सदाबली च साबिरः सुकर्मकृद्यदा भवेत्॥२॥…
इक नाहीं इक पीर, हिय रहीम होती रहै। कबहुँ न भई सरीर, प्रीति बेदना एक-सी॥१॥ ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अँगार ज्यों। तातो जारै अंग, सीरे पै कारो करै॥२॥…