सोरठे
R Rahim
Günün şiiri
· 11 Ağustos 2026
0
Altın Yaprak
इक नाहीं इक पीर, हिय रहीम होती रहै।
कबहुँ न भई सरीर, प्रीति बेदना एक-सी॥१॥
ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अँगार ज्यों।
तातो जारै अंग, सीरे पै कारो करै॥२॥
गई आगि उर लाय, आगि लैन आई जु तिय।
लागी नाहिं बुझाय, भभकि-भभकि बरि-बरि उठै॥३॥
चूल्हा दीन्हो बारि, नातो रह्यो सो जरि गयो।
रहिमन उतरे पार, भार झोंकि सब भार में॥४॥
दीपक हिए छिपाइ, नवल बधू घर लै चली।
कर बिहीन पछिताइ, कुच लखि निज सीसै धुनै॥५॥
पलटि चली मुसकाइ, द्युति रहीम उपजाइ अति।
बाती सी उसकाइ, मानौ दीन्ही दीप की॥६॥
बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहै।
हेरनहार हिरान, रहिमन आपुहि आपु मैं॥७॥
रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीजै नहीं॥
तैसे मूरुख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं॥८॥
रहिमन कीन्ही प्रीत, साहब को भावै नहीं।
जिनके अनगन मीत, हमैं गरीबन को गनै॥९॥
रहिमन पुतरी स्याम, मनौ जलज मधुकर लसै।
कै धौं सालिकराम, रूपे के अरघा धरे॥१०॥
रहिमन जग की रीति, मैं देखा रस ऊख मैं।
ताहू मैं परतीति, जहाँ गाँठि तहँ रस नहीं॥११॥
नैन जोरि मुख मोरि हँसि, नैसुक नेह जनाइ।
आगि लेन आई जु तिय, मेरे गई लगाइ॥
Kamu malı: şairin ölümünün üzerinden 70 yıldan fazla geçti.
Metnin kaynağı: Kamu malı arşiv
Bu şiiri puanla
Henüz puan verilmemiş