हमारा स्वर्ग - माँ... Hamara
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Altın Yaprak
हमारा स्वर्ग - माँ
बुधवार, २२ जुलाई २०२०
तुम ही रही मेरी कल्पना
सदा करूतेरी वंदना
जहाँ जहाँ में नजर करूँ
पाऊँमें तुम्हे रूबरू।
तू ही तो थी वंदनीय
ऒर सदा पूजनीय
जब भी देखती मेरी सूरत दयनीय
तेरी शकल हो जाती स्मरणीय।
हमारे सुखमे सुख
ओर दुःख मे दुख
समा लिया अपनी कोख
बंधाई ढाढस हमेंऐसा देख।
ना अपनी फ़िक्र और नाही कोई संताप
हमें ना करने करने देती कोई विलाप
मिलातीहमेशा हमारे सुर में सुर
हम भी रहते मशगूल औरकरते गुरुर।
ये सबमाँ ही कर सकती है
अपना सुख -चैन सब छोड़ सकती है
रात-रात भर जगकर हमे सुलाती है
नैनों में बेचैनी फिर भी लोरी सुनाती है।
हमारा स्वर्ग तो माँ की चरणों में है
हमारी रग-रग मे उसका खुन बेहता है
माँ गंगा की तरहपावन ओर पवित्र हो तुम
हममेंहो तुमओर तुज में है हम।
सदा रहो हमारे सामने और ना हो ओझल
बस बहती रहो सदा बन के शीतल जल
नहीं बनती कोई कल्पना बिन शीतल छाँव
उजड़ा लगेगा तुम बिन हमारा गाँव।
हसमुख मेहता
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