ना कोई डोर थी.. Nakoi
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Altın Yaprak
ना कोई डोर थी
Tuesday, August 18,2020
5: 43 AM
ना हाथ मे कोईडोर थी
ना मंझिल किसी छोर थी
बस मन में तमन्ना कुछ ओर थी
जीने कीबड़ी चाह थी।
चल पड़ा में उसी राहपर
ना भरोसा था किसी और पर
बाँध लिया था सरपर कफ़न
ना बढ़ी थी कभी दिल की धड़कन।
मेरे उत्साह का ना था कोई विकल्प
भले ही आयुष्य मिला था अलप!
कुछ नया करने की ठान ली
सोचा और अपनी जगा बना ली।
दिल थामकर बैठ गया प्रतीक्षा में
कुछ नया होगा अपेक्षा में
क्या रखा है किसीकी उपेक्षा में?
पास तो होना ही है अपनी कक्षा में।
ना डर था किसी को खोने का!
और ना वक्त था सोने का
बस जज्बा ये हिम्मत अपनी थी
बाकी बन गयी वो एक कहानी थी।
आगे होगा वो देखा जाएगा
हवा का रुख भी पहचाना जाएगा
वक्त के रहते सब कुछ करना होगा
सफर इतना आसान तो नहीं होगा।
हम बने है सागर के मरजीवा
नहीं डूबना है बस रहना है तैरना
समंदर के खजाने को है पाना
मकसद में कामयाब हो जाना।
डॉ जड़िआ हसमुख
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