कौन है वो
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Altın Yaprak
मै तो अकेला ही चला था सफर-ए-इम्तेहान में,
वो कौन है जो अक्स बन पीछा कर रहा है?
उसे राह से भटकाऊ सोच मै मुडा, कुछ इधर उधर
कुछ हासिल न हुआ, वो पीछे ही रहा मेरे I
वो धुल को भी तो बखूबी उडाता है,
और मेरे बोल को ऊँची आवाज़ दिलाता है I
मुझे शर्म आती है उसके देहलीज़ पर जाने के लिया
बहुत छोटा हूँ न, आदाब नहीं जानता मै I
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