آهو
ش شاطر عباس صبوحی
0
स्वर्ण पत्ता
مردم از حسرت آهوروشان و رمشان
من ندانم به چه تدبیر به دام آرمشان
نیک رویان جهان را چو سرشتند ز گل
سنگی اندر گلشان بود همان شد دلشان
इस कविता को आँकें
अभी कोई आँक नहीं
टिप्पणियाँ
टिप्पणी करने के लिए प्रवेश करना होगा।
प्रवेशइस कविता पर अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहले आप हों।