खयाली पुलाव
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Altın Yaprak
मन, हाँ ये मेरामन
आपने में ही गुमसुम
बुने जा रहा है, महल
मन, ये मेरा मन.
पल भर के लिए
में भी सोच में पड़ गया
की जाने क्या हो गया
मेरे इस मन को मानो.
मानो जैसे खो गया हो
इस विशाल समुद्र मुद्र में के
उचाई, गहराई और लंबाई में
आंजना लगे अब दुनिया सारा भी।
मन, ये मेरा मन
चंचल चितवन
गोते खाये बार बार हर बार
खयाली पुलाव की नाव में.।
सवाल ये नहीं, की वो गोता मारता ही क्यों
सवाल ये है की वो गोता मारे ही क्यों
जब जग्ग सारा लगे सुन्हेरा
तो मन ने लेना क्यों गोता।
गोते की तो बात ही न करो तुम
रघुराम तो हैं नहीं हम
और गंगाराम हो नहीं तुम
जो डाल डाल और पात पात करे हम।।
पुलाओ तो ख़याली हो ही जाता
मन के तरल बहाव में
गोते के लुभावने स्वाभाव में
और मेरे उद्गार भाव में. ।
मन तो हमेशा सींचे पुलिंदे जुड़ाव के
तन तो हमेशा चाहे खिचाव
है रब्बा मैं तो हमेशा मांगू
दो पल का सुख और चैन रे।
क्या खयाली पुलाव,
क्या धुप और चाऊ
मन तो मन है जी
जीने के लिए रास्ता
ढूंढ ही लेता है जी.।।
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