बातें करते वह दो पेड़
M
0
Altın Yaprak
अभी अभी तो पौधे थे वह
न जाने कब पेड़ हुए
एक बना नीम का पेड़
तो दूजा हुआ बेर का पेड़
संग संग वो झूला झूले
संग संग धुप भी खायी
बारिश में भी डेट रहे
अंधी भी न कुछ कर पायी
आठ फिट की दुरी थी उनमे
मगर जड़ें पाताल में मिली थी
डालियाँ भी बढ़ बढ़ कर
कुछ टकराने लगी थी ज़मीन पे
लगता था सब कुछ समान
फिर अंतर समझ आने लगा
पंछियों ने डेरा डाला नीम पर
बेर के हिस्से में सूनापन आया
राही भी रुकते नीम तले
बेर के काँटों से बचे बचे
बच्चे भी कतराते थे
बेर लगे तब आते थे
रातों को वे एक दूसरे से
आप बीती बतियाते थे
सुख दुःख के वो संगी थे
एक दूसरे का ढाढ़स बढ़ाते थे
समय कहाँ स्थिररहता है
हर सैकड़ा रंग बदलता है
नयी खोज और विचारों से
जीवन प्रगति करता है
मनुष्यों ने भी समय के चलते
दुनियां नयी बना ली है
तरक्की की उद्योग जगत ने
अब सडकों की जाल बनानी है
इस नयी सोच ने ये न सोचा
कीमत क्या क्या चुकानी है
और इन नयी सडकों का संकट
अब नीम और बेर के पेड़ पर हुआ
दोनों पर निशान लगे, उन्हें क्या पता था की
उनकी भी गिनती अब शहीदों में होने को है
वे प्रसन्न थे के कुछ इनाम मिलने वाला है
बेख़बर इस बात से की नामोनिशान मिटने वाला है
Bu şiiri puanla
Henüz puan verilmemiş